अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
इन्ही ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा
अँधेरी रात के पर्दे में दिन की रौशनी भी है
- अख़्तर शीरानी
मेरी क़िस्मत है ये आवारा-ख़िरामी 'साजिद'
दश्त को राह निकलती है न घर आता है
- ग़ुलाम हुसैन साजिद
कटती है आरज़ू के सहारे पे ज़िंदगी
कैसे कहूँ किसी की तमन्ना न चाहिए
- शाद आरफ़ी
आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना है
जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है
- जिगर मुरादाबादी
Urdu Poetry: अंधेरा है कैसे तिरा ख़त पढ़ूँ लिफ़ाफ़े में कुछ रौशनी भेज दे