अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते
किसी की आँख में रह कर सँवर गए होते
- बशीर बद्र
आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना है
जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है
- जिगर मुरादाबादी
बाक़ी है अब भी तर्क-ए-तमन्ना की आरज़ू
क्यूँकर कहूँ कि कोई तमन्ना नहीं मुझे
- आदिल असीर देहलवी
Urdu Poetry: ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ काश तुझ को भी इक झलक देखूँ