अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तलाश-ए-रिज़्क़ का ये मरहला अजब है कि हम
घरों से दूर भी घर के लिए बसे हुए हैं
- आरिफ़ इमाम
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो
- जौन एलिया
हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ
शीशे के महल बना रहा हूँ
- क़तील शिफ़ाई
हादसे राह के ज़ेवर हैं मुसाफ़िर के लिए
एक ठोकर जो लगी है तो इरादा न बदल
- ताहिर फ़राज़
Urdu Poetry: मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं, फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं