Urdu Poetry: शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यूँ
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है
- इफ़्तिख़ार आरिफ़  

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शाम को तेरा हँस कर मिलना
दिन भर की उजरत होती है
- इशरत आफ़रीं

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ख़ुद-बख़ुद राह लिए जाती है उस की जानिब
अब कहाँ तक है रसाई मुझे मालूम नहीं
- मोहम्मद आज़म

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अब मिरी कोई ज़िंदगी ही नहीं
अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या
- जौन एलिया

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शिकवा कोई दरिया की रवानी से नहीं है
रिश्ता ही मिरी प्यास का पानी से नहीं है
- शहरयार

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रंग आँखों के लिए बू है दिमाग़ों के लिए
फूल को हाथ लगाने की ज़रूरत क्या है
- हफ़ीज़ मेरठी

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Urdu Poetry: ये ग़म नहीं है कि हम दोनों एक हो न सके

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