Urdu Poetry: अब की रुत में जब धरती को बरखा की महकार मिले

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अब की रुत में जब धरती को बरखा की महकार मिले
मेरे बदन की मिट्टी को भी रंगों में नहला देना
- रईस फ़रोग़ 

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ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया
- साहिर लुधियानवी 

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नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं
- हसरत मोहानी 

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जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी
जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़   

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चलो कहीं पे तअल्लुक़ की कोई शक्ल तो हो
किसी के दिल में किसी की कमी ग़नीमत है
- आफ़ताब हुसैन

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सुना है शहर का नक़्शा बदल गया 'महफ़ूज़'
तो चल के हम भी ज़रा अपने घर को देखते हैं
- अहमद महफ़ूज़

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Urdu Poetry: इक ख़्वाब ही तो था जो फ़रामोश हो गया

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