अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कब धूप चली शाम ढली किस को ख़बर है
इक उम्र से मैं अपने ही साए में खड़ा हूँ
- अख़्तर होशियारपुरी
धूप रुस्वाई का सामान लिए फिरती है
उस को आना था तो आ जाता मगर शाम के बाद
- क़मर सुरूर
हम परिंदों से हुनर छीनेगा कौन
जल गया इक घर तो सौ घर बन गए
- ज़ीनतउल्लाह जावेद
देख रह जाए न तू ख़्वाहिश के गुम्बद में असीर
घर बनाता है तो सब से पहले दरवाज़ा लगा
- अर्श सिद्दीक़ी
दर्द हो तो दवा भी मुमकिन है
वहम की क्या दवा करे कोई
- यगाना चंगेज़ी
शाम ढले ये सोच के बैठे हम अपनी तस्वीर के पास
सारी ग़ज़लें बैठी होंगी अपने अपने मीर के पास
- साग़र आज़मी
Urdu Poetry: हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है