Urdu Poetry: वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो हौसले मुश्किलों में पलते हैं

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो
हौसले मुश्किलों में पलते हैं
- महफूजुर्रहमान आदिल

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इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद
- कैफ़ी आज़मी

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दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया
- मीर तक़ी मीर

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बस मोहब्बत बस मोहब्बत बस मोहब्बत जान-ए-मन
बाक़ी सब जज़्बात का इज़हार कम कर दीजिए
- फ़रहत एहसास

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Urdu Poetry: इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं

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