Urdu Poetry: यही जाना कि कुछ न जाना हाए सो भी इक उम्र में हुआ मालूम

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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यही जाना कि कुछ न जाना हाए
सो भी इक उम्र में हुआ मालूम
- मीर तक़ी मीर

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हद से बढ़े जो इल्म तो है जहल दोस्तो
सब कुछ जो जानते हैं वो कुछ जानते नहीं
- ख़ुमार बाराबंकवी

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हम पे ये राज़ खुला भी तो बहुत देर के बा'द
अस्ल किरदार कहानी में किसी और का है
- असद बिजनौरी अलीग      

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नामा-बर तू ही बता तू ने तो देखे होंगे
कैसे होते हैं वो ख़त जिन के जवाब आते हैं
- क़मर बदायूंनी  

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मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे
- इफ़्तिख़ार आरिफ़   

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गुरेज़-पा है नया रास्ता किधर जाएँ
चलो कि लौट के हम अपने अपने घर जाएँ
- जमाल ओवैसी

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