Urdu Poetry: जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने
- शहरयार

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तुम लगाते चलो अश्जार जिधर से गुज़रो
उस के साए में जो बैठेगा दुआ ही देगा
 - अज्ञात

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यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे
- बशीर बद्र

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बहारों की नज़र में फूल और काँटे बराबर हैं
मोहब्बत क्या करेंगे दोस्त दुश्मन देखने वाले
- कलीम आजिज़

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फ़र्क़ नहीं पड़ता हम दीवानों के घर में होने से
वीरानी उमड़ी पड़ती है घर के कोने कोने से
- मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

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ये पानी ख़ामुशी से बह रहा है
इसे देखें कि इस में डूब जाएँ
- अहमद मुश्ताक़

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Urdu Poetry: वही कारवाँ वही रास्ते वही ज़िंदगी वही मरहले

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