Urdu Poetry: ढूँढ़ लाया हूँ ख़ुशी की छाँव जिस के वास्ते

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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ढूँढ़ लाया हूँ ख़ुशी की छाँव जिस के वास्ते
एक ग़म से भी उसे दो-चार करना है मुझे
- ग़ुलाम हुसैन साजिद 

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सारी ख़ुशी हमारी आँखों से छन रही है
कुछ देर तुम ने गेसू लहरा दिए तो क्या है
- रउफ़ रज़ा 

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दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ
घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना
- सलीम अहमद 

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एक मुद्दत से अपने घर में हैं
फिर भी लगता है हम सफ़र में हैं
- सय्यद रियाज़ रहीम

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किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को
काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
- आदिल मंसूरी

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इश्क़ को एक उम्र चाहिए और
उम्र का कोई ए'तिबार नहीं
- जिगर बरेलवी 

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Urdu Poetry: अभी से लौट चलो घर अभी उजाला है

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