अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचियता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे
- साहिर लुधियानवी
मानी हैं मैं ने सैकड़ों बातें तमाम उम्र
आज आप एक बात मिरी मान जाइए
- अमीर मीनाई
बहुत दूर तो कुछ नहीं घर मिरा
चले आओ इक दिन टहलते हुए
- हफ़ीज़ जौनपुरी
कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है
कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से
- क़सरी कानपुरी
जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी
जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मुसाफ़िर ही मुसाफ़िर हर तरफ़ हैं
मगर हर शख़्स तन्हा जा रहा है
- अहमद नदीम क़ासमी
Urdu Poetry: ढूँढ़ लाया हूँ ख़ुशी की छाँव जिस के वास्ते