अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को
काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
- आदिल मंसूरी
ख़्वाब, उम्मीद, तमन्नाएँ, तअल्लुक़, रिश्ते
जान ले लेते हैं आख़िर ये सहारे सारे
- इमरान-उल-हक़ चौहान
दर्द ओ ग़म दिल की तबीअत बन गए
अब यहाँ आराम ही आराम है
- जिगर मुरादाबादी
वहाँ हमारा कोई मुंतज़िर नहीं फिर भी
हमें न रोक कि घर जाना चाहते हैं हम
- वाली आसी
हाए कोई दवा करो हाए कोई दुआ करो
हाए जिगर में दर्द है हाए जिगर को क्या करूँ
- हफ़ीज़ जालंधरी
मुझे दुनिया के ता'नों पर कभी ग़ुस्सा नहीं आता
नदी की तह में जा के सारे पत्थर बैठ जाते हैं
- मुकेश आलम
Urdu Poetry: आदमी अपने ख़यालात लिए फिरता है