अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
घूरने से क्या तुम्हारी आँखों के हम डर गए
वे अगर हैं मस्त ऐ प्यारे तो दीवाने हैं हम
-रज़ा अज़ीमाबादी
बहुत मासूम हैं 'नाशाद' कर के हम को दीवाना
हमीं से पूछते हैं चाक-दामानों पे क्या गुज़री
- इसहाक़ नाशाद
ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई
- मुज़फ़्फ़र रज़्मी
सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं
गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं
- मीर हसन
न जाना कि दुनिया से जाता है कोई
बहुत देर की मेहरबाँ आते आते
- दाग़ देहलवी
शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी
कोई पत्थर से न मारे मिरे दीवाने को
- तुराब काकोरवी
Urdu Poetry: मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा