अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का
- फ़ानी बदायूंनी
वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी
- नासिर काज़मी
जब आ जाती है दुनिया घूम फिर कर अपने मरकज़ पर
तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यूँ नहीं आते
- इबरत मछलीशहरी
ये पानी ख़ामुशी से बह रहा है
इसे देखें कि इस में डूब जाएँ
- अहमद मुश्ताक़
उस वक़्त का हिसाब क्या दूँ
जो तेरे बग़ैर कट गया है
- अहमद नदीम क़ासमी
कौन डूबेगा किसे पार उतरना है 'ज़फ़र'
फ़ैसला वक़्त के दरिया में उतर कर होगा
- अहमद ज़फ़र
Urdu Poetry: ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे