अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बड़ी आरज़ू थी हम को नए ख़्वाब देखने की
सो अब अपनी ज़िंदगी में नए ख़्वाब भर रहे हैं
- उबैदुल्लाह अलीम
बड़ी आरज़ू थी हम को नए ख़्वाब देखने की
सो अब अपनी ज़िंदगी में नए ख़्वाब भर रहे हैं
- उबैदुल्लाह अलीम
चाय की बरकत से ख़ाली हैं
देर में अक्सर उठने वाले
- सुहैल आज़ाद
निगाहें इस क़दर क़ातिल कि उफ़ उफ़
अदाएँ इस क़दर प्यारी कि तौबा
- आरज़ू लखनवी
Urdu Poetry: है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है