अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
जिस्म तो ख़ाक है और ख़ाक में मिल जाएगा
मैं बहर-हाल किताबों में मिलूँगा तुम को
- होश नोमानी रामपुरी
इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का
- फ़ानी बदायूंनी
अपना घर आने से पहले
इतनी गलियाँ क्यूँ आती हैं
- मोहम्मद अल्वी
जाने कितने लोग शामिल थे मिरी तख़्लीक़ में
मैं तो बस अल्फ़ाज़ में था शाएरी में कौन था
- भारत भूषण पन्त
तेरी बातें ही सुनाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
- अहमद फ़राज़
अब तो चुप-चाप शाम आती है
पहले चिड़ियों के शोर होते थे
- मोहम्मद अल्वी
Urdu Poetry: पलट न जाएँ हमेशा को तेरे आँगन से