अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
पता अब तक नहीं बदला हमारा
वही घर है वही क़िस्सा हमारा
- अहमद मुश्ताक़
किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से
हर जगह ढूँढ़ता फिरता है मुझे घर मेरा
- निदा फ़ाज़ली
नींद मिट्टी की महक सब्ज़े की ठंडक
मुझ को अपना घर बहुत याद आ रहा है
- अब्दुल अहद साज़
एक मुद्दत से अपने घर में हैं
फिर भी लगता है हम सफ़र में हैं
- सय्यद रियाज़ रहीम
घर बनाने में 'उम्र लगती है
घर में बनते मकान देखे हैं
- अवनीश त्रिवेदी अभय
फ़लक पे चाँद मोहर्रम का जब नज़र आया
सफ़र में याद मुसाफ़िर को अपना घर आया
- नसीम घोसवी
Urdu Poetry: जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा