अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मुद्दत से ख़्वाब में भी नहीं नींद का ख़याल
हैरत में हूँ ये किस का मुझे इंतिज़ार है
- शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
आवाज़ दे रहा था कोई मुझ को ख़्वाब में
लेकिन ख़बर नहीं कि बुलाया कहाँ गया
- फ़ैसल अजमी
दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए
ख़्वाबों की शाल ओढ़ के मैं ऊँघता रहा
- आदिल मंसूरी
मरने के बा'द ख़ुद ही बिखर जाऊँगा कहीं
अब क़ब्र क्या बनेगी अगर घर नहीं बना
- बेदिल हैदरी
ये बस्तियाँ बड़ी गुंजान हैं मगर इन में
किसी गली में नहीं कोई घर तुम्हारे सिवा
- शाहिदा लतीफ़
ज़िंदगी शम्अ की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम'
बुझ तो जाऊँगा मगर सुबह तो कर जाऊँगा
- अहमद नदीम क़ासमी
Urdu Poetry: शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है