अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की
- परवीन शाकिर
कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है
कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से
- क़सरी कानपुरी
ज़माने भर के ग़म या इक तिरा ग़म
ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे
- हफ़ीज़ होशियारपुरी
उन दिनों घर से अजब रिश्ता था
सारे दरवाज़े गले लगते थे
- मोहम्मद अल्वी
Urdu Poetry: ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त सोच लें