अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
- अहमद फ़राज़
हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक
- मिर्ज़ा ग़ालिब
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
- फ़िराक़ गोरखपुरी
वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
- दाग़ देहलवी
हम से क्या हो सका मोहब्बत में
ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की
- फ़िराक़ गोरखपुरी
फिर तुझे और मुझे और कहीं जाना है
हम-सफ़र साथ तो चल जितनी सड़क बाक़ी है
- शकील जाज़िब
Urdu Poetry: हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब