अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
न जाने कौन सी मंज़िल पे इश्क़ आ पहुँचा
दुआ भी काम न आए कोई दवा न लगे
- अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी
मुझ को अब कैसे पा सकेगा कोई
वक़्त था और गुज़र गया हूँ मैं
- शारिक़ जमाल
न वो सूरत दिखाते हैं न मिलते हैं गले आ कर
न आँखें शाद होतीं हैं न दिल मसरूर होता है
- लाला माधव राम जौहर
आह जो दिल से निकाली जाएगी
क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी
- अकबर इलाहाबादी
Urdu Poetry: आज भी नक़्श हैं दिल पर तिरी आहट के निशाँ