अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
इश्क़ में कुछ नज़र नहीं आया
जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है
- नूह नारवी
हज़ारों ज़ुल्म हों मज़लूम पर तो चुप रहे दुनिया
अगर मज़लूम कुछ बोले तो दहशत-गर्द कहती है
- ज़मीर अतरौलवी
अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए
- अहमद फ़राज़
लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से
तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से
- जाँ निसार अख़्तर
Urdu Poetry: मुझ को अख़बार सी लगती हैं तुम्हारी बातें