अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बाक़ी है अब भी तर्क-ए-तमन्ना की आरज़ू
क्यूँकर कहूँ कि कोई तमन्ना नहीं मुझे
- आदिल असीर देहलवी
ज़िंदगी क्या जो बसर हो चैन से
दिल में थोड़ी सी तमन्ना चाहिए
- जलील मानिकपुरी
मिरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है
तुम्हारे साथ मिल कर ख़ुद को धोना चाहता हूँ मैं
- फ़रहत एहसास
गिरा दिया है तो साहिल पे इंतिज़ार न कर
अगर वो डूब गया है तो दूर निकलेगा
- अमीर क़ज़लबाश
आई होगी किसी को हिज्र में मौत
मुझ को तो नींद भी नहीं आती
- अकबर इलाहाबादी
हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए
और होंगे तिरी महफ़िल से उभरने वाले
- दाग़ देहलवी
Urdu Poetry: अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उमीदें