अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ये ग़म नहीं है कि हम दोनों एक हो न सके
ये रंज है कि कोई दरमियान में भी न था
- जमाल एहसानी
अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती
किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का ग़म है
- दिवाकर राही
जम्अ' हम ने किया है ग़म दिल में
इस का अब सूद खाए जाएँगे
- जौन एलिया
हज़ार तरह के थे रंज पिछले मौसम में
पर इतना था कि कोई साथ रोने वाला था
- जमाल एहसानी
रात को रोज़ डूब जाता है
चाँद को तैरना सिखाना है
- बेदिल हैदरी
एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा
- निदा फ़ाज़ली
Urdu Poetry: मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था