अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा
मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा
- कैफ़ भोपाली
गिरेगी कल भी यही धूप और यही शबनम
इस आसमाँ से नहीं और कुछ उतरने का
- हकीम मंज़ूर
मौत का इंतिज़ार बाक़ी है
आप का इंतिज़ार था न रहा
- फ़ानी बदायूंनी
ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया
- साहिर लुधियानवी
ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं ने
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला
- बशीर बद्र
Urdu Poetry: ऐ ज़िंदगी वगर्ना ज़माने में क्या न था