अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हुस्न इक दिलरुबा हुकूमत है
इश्क़ इक क़ुदरती ग़ुलामी है
- अब्दुल हमीद अदम
जीने वालों से कहो कोई तमन्ना ढूँडें
हम तो आसूदा-ए-मंज़िल हैं हमारा क्या है
- महमूद अयाज़
जिस भी फ़नकार का शहकार हो तुम
उस ने सदियों तुम्हें सोचा होगा
- अहमद नदीम क़ासमी
तुम्हें तो ठीक से बर्बाद करना भी नहीं आता
चलो पीछे हटो अपनी ये हालत मैं बनाता हूँ
- शब्बीर हसन
हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर'
उदासी बाल खोले सो रही है
- नासिर काज़मी
कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
- राजेन्द्र मनचंदा बानी
Urdu Poetry: ज़िंदगी मैं तुझे नाकाम न होने दूँगा