अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है
- बशीर बद्र
कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है
कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से
- क़सरी कानपुरी
कोई समझेगा क्या राज़-ए-गुलशन
जब तक उलझे न काँटों से दामन
- फ़ना निज़ामी कानपुरी
आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है
- वसीम बरेलवी
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम
- जौन एलिया
जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ
उस ने सदियों की जुदाई दी है
- गुलज़ार
Urdu Poetry: चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है