अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
शाख़ पर हों कि उन के जूड़े में
उम्र है एक रात फूलों की
- शाद फ़िदाई देहलवी
उस को हँसता देख के फूल थे हैरत में
वो हँसती थी फूलों की हैरानी पर
- अम्मार यासिर मिगसी
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे
- वसीम बरेलवी
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
- मिर्ज़ा ग़ालिब
Urdu Poetry: कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी