अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
- बशीर बद्र
ज़िंदगी जब अज़ाब होती है
आशिक़ी कामयाब होती है
- दुष्यंत कुमार
उठाओ कैमरा तस्वीर खींच लो इन की
उदास लोग कहाँ रोज़ मुस्कुराते हैं
- मालिकज़ादा जावेद
जाते जाते आप इतना काम तो कीजे मिरा
याद का सारा सर-ओ-सामाँ जलाते जाइए
- जौन एलिया
Urdu Poetry: होश उड़ जाते हैं अब भी तिरी आवाज़ के साथ