Urdu Poetry: मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था
- अंजुम रहबर 

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कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की
- गुलज़ार

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अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा
तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो
- बशीर बद्र

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देखने के लिए सारा आलम भी कम
चाहने के लिए एक चेहरा बहुत
- असअ'द बदायूंनी 

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इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा
आदमी काम का नहीं होता
- जिगर मुरादाबादी

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इश्क़ माशूक़ इश्क़ आशिक़ है
यानी अपना ही मुब्तला है इश्क़
- मीर तक़ी मीर 

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Urdu Poetry: मुसाफ़िरों से मोहब्बत की बात कर लेकिन

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