अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
पैग़ाम तो उन का आया है तुम शहर में 'तिश्ना' आ जाओ
सहरा है पसंदीदा हम को हम शहर में जा कर क्या करते
- ज़हीर-उल-हसन तिश्ना
और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया
- साहिर लुधियानवी
आज देखा है तुझ को देर के बअ'द
आज का दिन गुज़र न जाए कहीं
- नासिर काज़मी
मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था
- अंजुम रहबर
पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
- बशीर बद्र
Urdu Poetry: किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से