Urdu Poetry: ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 
 

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अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ
- मुसव्विर सब्ज़वारी 

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कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
- राजेन्द्र मनचंदा बानी 

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तुम अपने चाँद तारे कहकशाँ चाहे जिसे देना
मिरी आँखों पे अपनी दीद की इक शाम लिख देना
- ज़ुबैर रिज़वी

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एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं
- फ़िराक़ गोरखपुरी  

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Urdu Poetry: बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे

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