अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है
जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है
- सबा अफ़ग़ानी
सेहन-ए-गुलशन में कई दाम बिछे हैं ऐ 'असर'
उड़ के जाऊँ भी अगर मैं तो किधर जाऊँगा
- असर सहबाई
कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
- राजेन्द्र मनचंदा बानी
सुना है शहर का नक़्शा बदल गया 'महफ़ूज़'
तो चल के हम भी ज़रा अपने घर को देखते हैं
- अहमद महफ़ूज़
शाम को तेरा हँस कर मिलना
दिन भर की उजरत होती है
- इशरत आफ़रीं
अकेला उस को न छोड़ा जो घर से निकला वो
हर इक बहाने से मैं उस सनम के साथ रहा
- नज़ीर अकबराबादी
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