अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ये ज़िंदगी जो पुकारे तो शक सा होता है
कहीं अभी तो मुझे ख़ुद-कुशी नहीं करनी
- स्वप्निल तिवारी
हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल
ऐ ज़िंदगी वगर्ना ज़माने में क्या न था
- आज़ाद अंसारी
जुस्तुजू करनी हर इक अम्र में नादानी है
जो कि पेशानी पे लिक्खी है वो पेश आनी है
- इमाम बख़्श नासिख़
ख़्वाब होते हैं देखने के लिए
उन में जा कर मगर रहा न करो
- मुनीर नियाज़ी
कमरे में मज़े की रौशनी हो
अच्छी सी कोई किताब देखूँ
- मोहम्मद अल्वी
ज़िंदगी क्या जो बसर हो चैन से
दिल में थोड़ी सी तमन्ना चाहिए
- जलील मानिकपुरी
Urdu Poetry: जंगल जंगल आग लगी है दरिया दरिया पानी है