अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
अजब लहजा है उस की गुफ़्तुगू का
ग़ज़ल जैसी ज़बाँ वो बोलता है
- अज्ञात
फूल की ख़ुशबू हवा की चाप शीशे की खनक
कौन सी शय है जो तेरी ख़ुश-बयानी में नहीं
- अज्ञात
तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी
ख़ुद को गँवा के कौन तिरी जुस्तुजू करे
- अहमद फ़राज़
बहुत अज़ीज़ थी ये ज़िंदगी मगर हम लोग
कभी कभी तो किसी आरज़ू में मर भी गए
- अब्बास रिज़वी
Urdu Poetry: रोते रोते भी तिरे नाम पे हँस देता हूँ