अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
- अल्लामा इक़बाल
मुझ से तू पूछने आया है वफ़ा के मअ'नी
ये तिरी सादा-दिली मार न डाले मुझ को
- क़तील शिफ़ाई
आप सागर हैं तो सैराब करें प्यासे को
आप बादल हैं तो मुझ दश्त पे साया कीजिए
- अब्दुर्रहीम नश्तर
मेरे कहने में है दिल जब तक मिरे पहलू में है
आप ले लीजे इसे ये आप का हो जाएगा
- बेख़ुद देहलवी
वही अकेला है अंजुमन में
वही है तन्हा मकान में भी
- लुत्फ़ुर्रहमान
सुबूत है ये मोहब्बत की सादा-लौही का
जब उस ने वादा किया हम ने ए'तिबार किया
- जोश मलीहाबादी
Urdu Poetry: किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को