अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
गुरेज़-पा है नया रास्ता किधर जाएँ
चलो कि लौट के हम अपने अपने घर जाएँ
- जमाल ओवैसी
शाम को तेरा हँस कर मिलना
दिन भर की उजरत होती है
- इशरत आफ़रीं
जो पूरे होने से रह गए थे वो ख़्वाब रक्खे हुए हैं घर में
यक़ीन मानो पुरानी रुत के गुलाब रक्खे हुए हैं घर में
- मोहम्मद मुबशशिर मेयो
तुम ने सिर्फ़ चाहा है हम ने छू के देखे हैं
पैरहन घटाओं के जिस्म बर्क़-पारों के
- साहिर लुधियानवी
झील पर जैसे कोई काली घटा छा जाए
नीली आँखों पे घनी पलकों को डाले रखना
- शाहिद फ़रीद
वो चाँद कह के गया था कि आज निकलेगा
तो इंतिज़ार में बैठा हुआ हूँ शाम से मैं
- फ़रहत एहसास
Urdu Poetry: ज़िंदगी एक नज़्म लगती है