अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ
- मुसव्विर सब्ज़वारी
मुझे तो लगता है जैसे ये काएनात तमाम
है बाज़गश्त यक़ीनन सदा किसी की नहीं
- अदील ज़ैदी
हर मुसाफ़िर को कब मिली मंज़िल
हर मुसाफ़िर पे कब ग़ुबार खुला
- फ़ैज़ आलम बाबर
ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
अगरचे फूल ये अपने लिए ख़रीदे हैं
कोई जो पूछे तो कह दूँगा उस ने भेजे हैं
- इफ़्तिख़ार नसीम
शाख़ पर हों कि उन के जूड़े में
उम्र है एक रात फूलों की
- शाद फ़िदाई देहलवी
Urdu Poetry: ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त