अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ये दुनिया नफ़रतों के आख़री स्टेज पे है
इलाज इस का मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं है
- चरण सिंह बशर
हाल-ए-दिल क्यूँ कर करें अपना बयाँ अच्छी तरह
रू-ब-रू उन के नहीं चलती ज़बाँ अच्छी तरह
- बहादुर शाह ज़फ़र
ज़बाँ ख़ामोश मगर नज़रों में उजाला देखा
उस का इज़हार-ए-मोहब्बत भी निराला देखा
- तौक़ीर अहमद
मुस्कुराए वो हाल-ए-दिल सुन कर
और गोया जवाब था ही नहीं
- फ़ानी बदायूंनी
तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा
मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है
- अमीर मीनाई
मैं मरीज़ हूँ तिरे हिज्र का ज़रा हाथ में मिरा हाथ ले
तू ग़मों का मेरे इलाज कर मिरी बात सुन तू अभी न जा
- अर्पित शर्मा अर्पित
Urdu Poetry: चार फूलों से दबी जाती है तुर्बत मेरी