Urdu Poetry: तू ग़मों का मेरे इलाज कर मिरी बात सुन तू अभी न जा

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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मैं मरीज़ हूँ तिरे हिज्र का ज़रा हाथ में मिरा हाथ ले
तू ग़मों का मेरे इलाज कर मिरी बात सुन तू अभी न जा
- अर्पित शर्मा अर्पित

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शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे
ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे
- अज्ञात 

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देखा न कोहकन कोई फ़रहाद के बग़ैर
आता नहीं है फ़न कोई उस्ताद के बग़ैर
- अज्ञात

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रंजिशें ऐसी हज़ार आपस में होती हैं दिला
वो अगर तुझ से ख़फ़ा है तू ही जा मिल क्या हुआ
- जुरअत क़लंदर बख़्श

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Urdu Poetry: मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ

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