Urdu Poetry: मुझ को आदत है मुस्कुराने की

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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ऐ ग़म-ए-ज़िंदगी न हो नाराज़
मुझ को आदत है मुस्कुराने की
- अब्दुल हमीद अदम  

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मुसीबत और लम्बी ज़िंदगानी
बुज़ुर्गों की दुआ ने मार डाला
- मुज़्तर ख़ैराबादी

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घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है
- शहरयार

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ज़िंदगी ख़्वाब देखती है मगर
ज़िंदगी ज़िंदगी है ख़्वाब नहीं
- शबनम रूमानी

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हम को भी ख़ुश-नुमा नज़र आई है ज़िंदगी
जैसे सराब दूर से दरिया दिखाई दे
- महशर बदायूंनी  

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तन्हाई में करनी तो है इक बात किसी से
लेकिन वो किसी वक़्त अकेला नहीं होता
- अहमद मुश्ताक़ 

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Urdu Poetry: जो थी बहार तो गाते रहे बहार का राग

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