Urdu Poetry: इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर आ सको तो आओ

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर आ सको तो आओ
मिरे घर के रास्ते में कोई कहकशाँ नहीं है
- मुस्तफ़ा ज़ैदी   

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दरिया के तलातुम से तो बच सकती है कश्ती
कश्ती में तलातुम हो तो साहिल न मिलेगा
- मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

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आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
- दाग़ देहलवी 

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अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे
- वसीम बरेलवी 

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मैं हूँ दिल है तन्हाई है
तुम भी होते अच्छा होता
- फ़िराक़ गोरखपुरी

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मरज़-ए-इश्क़ जिसे हो उसे क्या याद रहे
न दवा याद रहे और न दुआ याद रहे
- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

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Urdu Poetry: वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा

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