अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तुम्हारे ख़त में नज़र आई इतनी ख़ामोशी
कि मुझ को रखने पड़े अपने कान काग़ज़ पर
- यासिर ख़ान इनाम
निकाले गए इस के मअ'नी हज़ार
अजब चीज़ थी इक मिरी ख़ामुशी
- ख़लील-उर-रहमान आज़मी
ख़ामोशी के नाख़ुन से छिल जाया करते हैं
कोई फिर इन ज़ख़्मों पर आवाज़ें मलता है
- अमीर इमाम
वो लोग मेरे बहुत प्यार करने वाले थे
गुज़र गए हैं जो मौसम गुज़रने वाले थे
- जमाल एहसानी
वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं
- ख़ुमार बाराबंकवी
किसी सबब से अगर बोलता नहीं हूँ मैं
तो यूँ नहीं कि तुझे सोचता नहीं हूँ मैं
- इफ़्तिख़ार मुग़ल
Urdu Poetry: ऐ काश हमारी क़िस्मत में ऐसी भी कोई शाम आ जाए