अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हर एक रात को महताब देखने के लिए
मैं जागता हूँ तिरा ख़्वाब देखने के लिए
- अज़हर इनायती
लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूँ
- बशीर बद्र
झील पर जैसे कोई काली घटा छा जाए
नीली आँखों पे घनी पलकों को डाले रखना
- शाहिद फ़रीद
वो कुछ मुस्कुराना वो कुछ झेंप जाना
जवानी अदाएँ सिखाती हैं क्या क्या
- बेख़ुद देहलवी
इक सफ़ीना है तिरी याद अगर
इक समुंदर है मिरी तन्हाई
- अहमद नदीम क़ासमी
जाने कितने लोग शामिल थे मिरी तख़्लीक़ में
मैं तो बस अल्फ़ाज़ में था शाएरी में कौन था
- भारत भूषण पन्त
Urdu Poetry: मैं तो 'मुनीर' आईने में ख़ुद को तक कर हैरान हुआ