Urdu Poetry: किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से
हर जगह ढूँढ़ता फिरता है मुझे घर मेरा
- निदा फ़ाज़ली  

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घर में क्या आया कि मुझ को
दीवारों ने घेर लिया है
- मोहम्मद अल्वी 

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ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है
क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम
- साहिर लुधियानवी   

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कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा
- अहमद फ़राज़  

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है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
- बशीर बद्र  

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किस दर्जा दिल-शिकन थे मोहब्बत के हादसे
हम ज़िंदगी में फिर कोई अरमाँ न कर सके
- साहिर लुधियानवी

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