Urdu Poetry: कौन कहे मा'सूम हमारा बचपन था

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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कौन कहे मा'सूम हमारा बचपन था
खेल में भी तो आधा आधा आँगन था
- शारिक़ कैफ़ी 

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दिल के आँगन में उभरता है तिरा अक्स-ए-जमील
चाँदनी रात में हो रात की रानी जैसे
- इरफ़ाना अज़ीज़ 

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किसी ने फिर से लगाई सदा उदासी की
पलट के आने लगी है फ़ज़ा उदासी की
- शाहिदा मजीद 

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कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है
- बशीर बद्र

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उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए
- इरफ़ान सिद्दीक़ी

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ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया
- साहिर लुधियानवी

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Urdu Poetry: मैं उस के सामने से गुज़रता हूँ इस लिए

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