अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
दिल लगाओ तो लगाओ दिल से दिल
दिल-लगी ही दिल-लगी अच्छी नहीं
- हफ़ीज़ जालंधरी
कोई दिल-लगी दिल लगाना नहीं है
क़यामत है ये दिल का आना नहीं है
- दत्तात्रिया कैफ़ी
वो सर्दियों की धूप की तरह ग़ुरूब हो गया
लिपट रही है याद जिस्म से लिहाफ़ की तरह
- मुसव्विर सब्ज़वारी
मिरे साए में उस का नक़्श-ए-पा है
बड़ा एहसान मुझ पर धूप का है
- फ़हमी बदायूंनी
भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले
न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिजक गई
- बशीर बद्र
ज़ेहन ओ दिल के फ़ासले थे हम जिन्हें सहते रहे
एक ही घर में बहुत से अजनबी रहते रहे
- इफ़्फ़त ज़र्रीं
Urdu Poetry: जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है