अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
- निदा फ़ाज़ली
धोका है इक फ़रेब है मंज़िल का हर ख़याल
सच पूछिए तो सारा सफ़र वापसी का है
- राजेश रेड्डी
मैं अब हर शख़्स से उक्ता चुका हूँ
फ़क़त कुछ दोस्त हैं और दोस्त भी क्या
- जौन एलिया
मैं हैराँ हूँ कि क्यूँ उस से हुई थी दोस्ती अपनी
मुझे कैसे गवारा हो गई थी दुश्मनी अपनी
- एहसान दानिश कांधलवी
ज़िक्र मेरा आएगा महफ़िल में जब जब दोस्तो
रो पड़ेंगे याद कर के यार सब यारी मिरी
- सदा अम्बालवी
नक़ाब-ए-रुख़ उठाया जा रहा है
वो निकली धूप साया जा रहा है
- माहिर-उल क़ादरी
Urdu Poetry: कौन कहे मा'सूम हमारा बचपन था