अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
आइना ये तो बताता है कि मैं क्या हूँ मगर
आइना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझ में
- कृष्ण बिहारी नूर
ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं
फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
अगर ऐ नाख़ुदा तूफ़ान से लड़ने का दम-ख़म है
इधर कश्ती न ले आना यहाँ पानी बहुत कम है
- दिवाकर राही
खिल रहे हैं गुलाब ज़ख़्मों के
शुक्रिया आप की नवाज़िश का
- एजाज़ रहमानी
अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ
- मुसव्विर सब्ज़वारी
दरवाज़े को बंद न रखना
घर में जाला पड़ जाता है
- इक़बाल असलम
Urdu Poetry: सच है एहसान का भी बोझ बहुत होता है