अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
जाने क्यूँ इक ख़याल सा आया
मैं न हूँगा तो क्या कमी होगी
- ख़लील-उर-रहमान आज़मी
न होगा कोई मुझ सा महव-ए-तसव्वुर
जिसे देखता हूँ समझता हूँ तू है
- गोया फ़क़ीर मोहम्मद
ज़िंदगी है या कोई तूफ़ान है!
हम तो इस जीने के हाथों मर चले
- ख़्वाजा मीर दर्द
कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है
- गुलज़ार
ज़िंदगी जब अज़ाब होती है
आशिक़ी कामयाब होती है
- दुष्यंत कुमार
आए ठहरे और रवाना हो गए
ज़िंदगी क्या है, सफ़र की बात है
- हैदर अली जाफ़री
Urdu Poetry: तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ